रविवार, 23 अक्टूबर 2011

दीपावली.....

घुरहू की बिटिया घिघियाती,बोतल दूध से खाली है ,
मेरा निकला दिवाला है उनके घर में दीवाली है।
दरवाजे पर बूढ़े बाबा आसूं पीकर सोते हैं,
आँगन में बेटवा पतोह दारू पीकर के लोटे हैं।
पेंशन पाने वालों के आगे डायबिटीज की थाली है,
मेरा निकला दिवाला है उनके घर में दीवाली है।
पाँव परूँ मैं तेरी गरीबी ममता से खिलवाड़ न कर
नित लुभावन दिखावे में रिश्तों पर प्रहार न कर,
लोक लुटेरे होश में आओ दीया तेल से खाली है,
मेरा निकला दिवाला है उनके घर में दिवाली है।

दीपशिखा की ढेरों कान्तियाँ हर देशवासी के चरण चूमें ..हे माँ ....

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

मुकम्मल छात्र संघ बनाम तवायफ छात्र संघ

छात्र संघ को लोकतंत्र की नर्सरी के रूप में शुरू से परिभाषित किया जाता रहा है। इस सीढ़ी से देश को अगुवाई तक मिली है सरीखे कई लुभावनी बातें राजनेताओं या कतिपय बुध्ह्जीवियों द्वारा अक्सर सुनने को मिलती हैं। छात्र संघ की जब भी बात होती है तो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अग्रणी भूमिका वाले इतिहास में होता है। फिर छात्रों के एक चुनावी मंच की चर्चा इस समय बीएचयू से जुड़े लोगों की जुबान पर सुलभ है। अतीत को बतियाते लोग नहीं अघा रहे हैं ,लेकिन जो वर्तमान में छात्र परिषद् नाम देकर चुनाव कराये जाने का डंका पीटा जा रहा है,ये निश्चय ही छात्र संघ के नाम पर एक मिथ्या मजाक और घटिया छलावा है। विश्वविद्यालय के करता-धर्ता चाहते है कि उनके काली करतूतों पर पर्दा पड़ा रहे और छात्रों को एक तावायफी मंच देकर भुलवाये रहा जाये जिससे साप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। जाहिर सी बात है ये मुकम्मल छात्र संघ नहीं हो सकता और जब तक मुकम्मल छात्र संघ के अलावा और किसी भी छलावे और प्रलोभन में छात्र फसते रहेंगें उन्हें उनका पूर्ण अधिकार नहीं मिल सकता।
छात्र परिषद् के इस चुनाव में एक महा सचिव और आठ सचिवों के चुने जाने की व्यवस्था का जिक्र है।उसमें पढ़ाकू छात्र ही चुनाव लडेगा इससे भी कोई गिला शिकवा नहीं है क्योंकि विश्वविद्यालय निश्चय ही पढने कि जगह है लेकिन इससे भी नाकारा नहीं जा सकता कि विश्वविद्यालय का छात्र अगर राजनीती और देश सेवा के लिए आगे आता था तो अपने कैरियर को बनाने के लिए नहीं बल्कि देश को बनाने के लिए ,वो बात दीगर है कि तरुनाई के अंगनाई में किये गए निःस्वार्थ संघर्ष ही उन्हें मुकाम दिलाते रहे और कालांतर में उसमें से बहुतेरे लूट और स्वार्थ के दलदल में फस गएँ। लेकिन इसका प्रतिशत काभी भी सौ नहीं हो सकता उसी में से विचारवान भी आये जो किसी दशा पर दिशा देने की समझ भी रखते हैं।
कहना गलत नहीं होगा की १९५६ से आज तक संसद और विधानसभाए छात्र संघ के लोगों से भरी रही हैं,आज भी देश के गृह मंत्री से लेकर तमाम बड़े राजनेता इस सीढ़ी से संसद तक ,पहुचे है ,लेकिन आज बीएचयू छात्र संघ चुनाव के नाम पर नौटंकी पर सबकी चुप्पी संदेहास्पद है। यह छात्र परिषद् छात्रसंघ का विकल्प नहीं हो सकता। चालीस साल पहले यहाँ कौन छात्र संघ का अध्यक्ष था वह कहा तक पंहुचा इसको बताने वाले बहुतेरे मिल जायेंगे लेकिन पिछले चार बार से छार परिषद् के मनोनीत छात्रों को कौन जानता है ,कारण ये उनकी कमी या गलती
नहीं है बल्कि उनको कोई न जाने या वो आगे न जा सके या देश और दुनिया की सक्रिय राजनीति में उनका किसी प्रकार का हस्तक्षेप और समझ न होसके इसीलिए विश्वविद्यालय के लोगों ने ये व्यवस्था बनाई।
अपना मुकम्मल छात्र संघ पाने से कम किसी भी कीमत पर छात्रों को समझौता नहीं करना चाहिए और उन्हें इस परिषद् के तवायफ छात्र संघ का बहिष्कार कर देना चाहिए। जिससे उनको उनका पूरा अधिकार मिल सके ,और ये नौटंकी बंद हो सके। छात्र परिषद् के लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सटीक न होने के वजह से लोकतंत्र को धोखा देने के जुर्म में विश्वविद्यालय के नीति-नियंताओं को कितना हूँ कोसा जाये कम है ।

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

एक सौ बयालीस साल के गाँधी

इस दो अक्टूबर को फिर गाँधी जयंती गाँधी के तथाकथित मानस पुत्रों द्वारा मनाया गया ,खूब हरे-राम के धुन बजाये गए,जो जितने पैसे वाला वो उतना देर तक बजाया ,जो जितने ताकतवाला वो उतने शोर से बजाया,और जो जितना बड़ा चोर था वो उतना दिल खोल कर बजाया। डर लग रहा था की कही कब्र से बाहर निकल कर गाँधी बाबा भी नाचने न लगें नहीं तो ये बड़े सामाजिक कारीगर पकड़ लिए जायेंगे,वैसे तो देश में इनके लिए न तो कोई जेल है न ही कोई कानून,लेकिन ये तर्क जो अच्छा दे लेते है की गाँधी भी तो कानून तोड़ते थे ,नमक कानून तोड़ डाला,अंग्रेजों के हर नियम का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन किया ,और हम उन्ही रास्तों पर चल रहे हैं ,तो बुरे क्यों,बात में तो जान है । जब ठेले पर हिमालय हो और चुल्लू में हो गंगा ,मुट्ठी में संविधान हो ,तो गाँधी क्यों न हो नंगा।
चलिए अब हम भी रंग जाये इसी रंग में और थोड़ी गाँधी के मन वाला नखरा कर के उन्हें सलाम कर दें...........
जय गाँधी ,जय भारत ।

शनिवार, 3 सितंबर 2011

लोकपाल बनाम भ्रष्टाचार

देश परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है अगर ऐसा कहा जाय तो शायद बहुत गलत नहीं होगा वो परिवर्तन कितना सार्थक हो पायेगा कितना राष्ट्र हित में चल पायेगा यह भविष्य की कोख में है। क्या भ्रष्टाचार ही बस देश को पीछे किये हुए है ,अगर हाँ तो क्या एक अन्ना की हैसियत है की देश डेढ़ अरब की भेड़-भीड़ को रामलीला मैदान में दहाड़ कर सुधार देंगे। निश्चय ही अन्ना साहब की सामाजिक सरोकारों की रूचि को सलाम किया जा सकता है ,उनके मेहनत,लगन और कारनामे अनुकरणीय रहे हैं । अपने गृह जनपद में सामान्य जनता से जुड़े बहुत सारे कार्य उन्होंने किया जोकि काफी सराहनीय है। लेकिन अन्ना के इस आन्दोलन से राष्ट्र को बड़ी क्षति हुई है,ठीक उसी तर्ज पर जैसे डॉ.अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बना कर देश को वैज्ञानिक दुर्भिक्ष में डाल दिया गया था। वैसे ही अन्ना अगर हर जिले में घूम के हकीकत के पायदान पर चलते हुए वह की विपत्तियों से लोगों को बचाहते और सारे गाँव को अपने गांव सरीखे बनाने का प्रयास करते ,जो उनके रूचि की विषयवस्तु है,तो शायद ज्यादे बेहतर होता। किताबी चापलूस फोटोकारों ने गाँधी से तुलना अन्ना की करके बेमानी की है,गाँधी जिस चम्पारन के विषय में जनता तक नहीं था वह एक गए बर्षों रह गया मगर वहां के हालत सुधार कर ही दम लिया। आज पूरे देश की स्थिति चम्पारन सरीखी हुई है ,लेकिन क्षोभ की गाँधी के नाम पर शोहरत हाशिल करने वाले लोग गाँधी के पद चिन्हों पर चलने में खुद को असहज पा रहे हैं।
दूसरी बड़ी चीज की अन्ना की लडाई भ्रष्टाचार है या लोकपाल। अगर लोकपाल की गोजी से ये भ्रष्टाचार की चुरईन को मरना चाहते है तो शायद बड़ी भूल कर रहे हैं। जो आदमी इतना तय नहीं कर पा रहा है की देश बड़ा है या कौम विशेष,उससे कितनी सार्थक उम्मीद की जाय। बात स्पस्ट करना चाहूँगा कि भारत माता की जय,और बन्दे मातरम का नारा जब उनके आन्दोलन कारियों द्वारा दिया जारहा था तो इमाम बुखारी ने कहा की अन्ना का आन्दोलन इस्लाम के खिलाफ है उर मुस्लिम वहां जाने से परहेज करें,यद्यपि किसी मुस्लिम पर बुखारी का असर नहीं पड़ा लेकिन अन्ना पर इतना असर पड़ा की वे रातोरात मंच से भारत मान की तस्वीर हटवा दिए,इतना ही नहीं अगले दिन अपने दो दूत अरविन्द केजरीवाल साब को और मोहतरमा किरण बेदी को उनको मनाने उनके घर भेज दिए। मुझे एक बात समझ में नहीं आयी की जब सारे मुस्लमान अपने धर्म से ऊपर उठ कर राष्ट्र धर्म के भाव से अन्ना के साथ जुड़े थे तो उन्हें अकेले बुखारी के बयां पर इतना लचीला होने की क्या जरूरत। बुखारी इस्लामिक नेता हो सकते हैं इस्लाम नहीं।
धन्यवाद.............

बुधवार, 17 अगस्त 2011

भ्रष्टाचार के सवाल पर अंधानुगाम से बचने की अपील

निश्चय ही किसी भी लोकतान्त्रिक राष्ट्र का संविधान उस देश की दशा और दिशा तय करता है साथ ही यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इसका निर्माण जनता के लिए होता है न कि सरकार के लिए। एक लोकतान्त्रिक देश में जनता सर्वोपरी होती है चाहे वो कोई राजनेता हो या कोई राजनयिक सभी को पद और प्रतिष्ठा कि शपथ दिलाते समय औपचारिक तौर पर इस तथ्य को याद दिलाया ही जाता है कि उसके कार्यों का एक मात्र उद्देश्य जनसेवा है । यह बात दीगर है कि हमारे थेथर दिमाग कि यह आदत बन चुका है,हम कशमों पर ध्यान देने कि जरूरत नहीं समझते हैं।
आज देश में भ्रष्टाचार एक अहम् सवाल बना हुआ है। इस सवाल ने महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव से उठाकर अन्ना हजारे को अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व बना दिया। लेकिन कभी भी किसी सवाल पर अंधानुगाम होना देश को गर्त में पहुचाने सरीखे है। अन्ना के साथ आज लाखों कि भीड़ है,लेकिन क्षोभ कि वे एक ऐसे ईमानदार कहे जा सकते हैं जो बेईमानों से घिरे हैं। उनके साथ जितने भी लोग हैं क्या अन्ना साहब कभी उनसे हाथ उठवा कर कश्में खिलवाये आप लोग न एक रूपये किसी को रिश्वत दोगे न एक रूपये किसी से रिश्वत स्वरुप लोगे,तो शायद नहीं। दूसरी चीज अन्ना का और वैचारिक समर्थन किया जा सकता है लेकिन एक बात समझ में नहीं आती कि क्या इस देश में अन्ना वाला लोकपाल आने से भ्रष्टाचार रुक जायेगा तो शायद नहीं,। ऐसा कहने के पीछे अन्ना कि साफगोई पर शक नहीं बल्कि अपनी मिटटी और खून पर अविश्वास है। जिन पच्घ-छः सदस्यी लोकपाल के सदस्यों कि बात इलेक्सन या सेलेक्शन से करने की हो रही है क्या सदैव इसकी सुचिता की गारंटी अन्ना ले पाएंगे तो शायद कत्तई नहीं। और फिर आगे चलकर यह लोकपाल भी संविधान के एनी अनुच्छेदों की तरह धरासायी पाया जायेगा। तरस तो आता है प्रधानमंत्री या देश की सरकार की मूर्खता पर उन्हें तो छूटते इस पर राजी हो जाना चाहिए ये लोग पता नहीं क्यों अन्ना को जिन्ना बनाने पर तुले हैं।
इस लिए अन्ना का मुहीम अगर घर-घर जाकर अखबारी फोटो के लोभ से ऊपर उठ कर लोगों को नैतिक तौर पर तैयार करता की वो न कही किसी को घूस देंगे न लेंगे तो शायद मैं भी पूरी तरह से उनके साथ होता क्योंकि इसमें जितना दिन बीतेगा उतनी सफाई होती जाएगी,लेकिन लोकपाल जितना पुराना होगा उतनी गन्दगी की पूरी-पूरी संभावना है।
अतएव हर उस राष्ट्रप्रेमी से कर बध्ह अनुरोध है कि अंधानुगाम से बचें और खुद को और अपने लोगों को उनके सबसे प्रिय और मूल्यवान कि कश्में दिलाये कि वो कही से भी भ्रष्टाचार की गंध नहीं बर्दाश्त करेंगे,कही धरना और कहीं प्रदर्शन कि कोई जरूरत नहीं है,और हर आदमी अन्ना होगा ,किसी अन्ना के साथ पिछलग्गू बनने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
जय हिंद..............

बुधवार, 3 अगस्त 2011

स्लाट वाक की नौटंकी भारतीय महिलाओं के लिए नहीं

भारत का एक दर नकलची इतिहास रहा है। अगर कोई बीच सड़क खड़ा होकर अपनी गर्दन असमान की तरफ कर देखना शुरू कर दे तो दस मिनट बाद एक लम्बी कतार बिना ये जाने या पूछे की असमान में है क्या ऊपर गर्दन किये नजर आएगी। महिलाओं का आन्दोलन स्लाट वाक अगर अमेरिका या ब्रिटेन में होता है तो ये बात समझ में आती है लेकिन भारत जैसे सांस्कृतिक देश में यह आवाज बेमानी लगती है। खास कर तब और क्षोभ होता है जब काफी पढ़ी लिखी और सुलझी मानसिकता की छवि रखने वाली महिलाएं सिर्फ महिला से जुड़े सवाल के वजह से इस बात की पक्षधर दिखती हैं वस्त्रों का विचारों पर असर नहीं पड़ता । इसका ये मतलब कत्तई नहीं है की मैं उनका विरोध और महिलाभक्षियों का पक्षधर हूँ । आज भी जो लोग चाहे वो पुरुष समाज के हों या महिला दुसरे घर की लड़की को कम वस्त्र में देखना तो पसंद करते हैं पर अपने घर की लड़की को कौन कम वस्त्र पहना नुमाईस का निमंत्रण देगा। इसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ गलत ही नहीं लगाया जाना चाहिए महिला किसी भी सभी समाज की गहना होती है और गहनों को सहेज कर और सलीके से रखा ही जाता है ,अगर विदेशी ऐसा करते है तो वो सिर्फ महिला को महिला ही समझते हैं या उनके यहाँ गहने सजोने का चलन नहीं रहा है,या हमारे यहाँ गहनों की पूजा भी होती जो उनके यहाँ नहीं होती है इसलिए ये लड़ाई उनके परिवेश में भले उचित हो पर हमारे देश में तो कत्तई उचित नहीं हो सकती।
वहीँ दूसरी तरफ कुछ लोग इसका समर्थन इस तर्क के साथ कर रहे हैं कि हमारा इतिहास नंगा रहा है,ये तर्क तर्क सांगत बस इसलिए नहीं लगता क्योंकि दुनिया का समाज एक साथ चला था ,शुरूआती दौर में कपडे के अभाव का नंगापन रिश्ते नहीं पनपने देता था जो असभ्य होने कि सबसे सटीक परिभाषा कही जा सकती है। इस लिए कम कपड़ों का पहना जाना असभ्यता को निमंत्रण भी हो सकता है। एक तर्क से सहमत तो होता हूँ कि कपडा नहीं सोच बदलने कि जरूरत है ये शत-प्रतिशत सही है पर ये बात पुरुष ही नहीं स्त्री सोच पर भी लागू होती है,वो अपना सोच कपड़ों के प्रति क्यों नहीं बदलती,और अगर हमें दूध ही पीने है तो क्या जरूरत है कि मधुशाला में बैठ कर पीयें।
जिस तरह कि घटनाये महिलाओं के सन्दर्भ में हो रही है वो चिंता का विषय तो है लेकिन इसको मशाला बनाने के बजाय सार्थक मनन कि जरूरत है न कि अख़बारों में टैटू लगा कर फोटो छपवाने की।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

भ्रष्टाचार आतंकवाद से बड़ा खतरा

निश्चय ही ये कहना गलत नहीं होगा की हमारे देश में भ्रष्टाचार और आतंकवाद दोनों ही सुरसा की तरह मुंह बाये देश को निगलने के लिए खड़े हैं। लेकिन एक बात तो तय है की आतंकवाद से बड़ा खतरा देश के लिए भ्रष्टाचार है कारण कि आतंकवादी तो सौ-पचास जानें मारता है जबकि ये देशी भ्रष्टाचारी समूची जनता को मारते हैं। अगर कसाब कि फांसी टलती है तो कोई बात नहीं लेकिन इन देशी लुटेरों को कई बार फासियाँ चढाने कि जरूरत है क्योंकि यदि उनका एक कतरा भी बचा रहा तो वो राष्ट्र का यूं ही खून चूसता रहेगा।
लेकिन दुर्भाग्य कि हम ऐसे संविधान में जीते हयाई जहाँ दोषी को बचने के लिए डेढ़ सौ नियम -क़ानून हैं जबकि ये कानून किसी निर्दोष को कितना बचा पते है ये बहस का विषय बन जाता है। अगर हम वास्तव में देश कि गरीबी दूर करना चाहते हैं या देश को भ्रष्टाचारियों से मुक्त कराना चाहते हैं तो एक रूपये कि काला बाजारी करने वाले को मौत की सजा से कम पर सोचना भी नहीं है यदि ऐसा संभव हो पाया तो भ्रष्टाचार निश्चित दूर होगा।
दूसरा सबसे बड़ा अहम् पहलू की जनता भी नेताओं के साथ कषम खाए साथ ही उस पर अमल करे यहाँ तो हम अपने बहन -बेटियों को शादी तक करते है तो एक ऐसे सरकारी क्लर्क को वर स्वरुप ढूढना ज्यादा पसंद करते है जो हजार-दो हजार ऊपरी कमाई करता हो,तो अपने भी गिरेबान में देखना होगा की जब हम अपने बहन -बेटी तक को एक राष्ट्रीय चोर के साथ बाँध देने में ज्यादे गर्व महसूस करते हैंतो ,हम क्या हैं और कहाँ हैं? सच तो यह है की इन सब की जड़ में हम सभी हैं ,अगर कोई बच्चा किसी की जेब से पचास रूपये चुरा ले तो हर बाप हरिश्चंद्र बन जाता है की कौन सी कमी पड़ी जो तुमने चोरी की,इतना कदा हो जाता है मानों बच्चे की जान लेलेगा,लेकिन अगर वही बच्चा कही से पचास लाख चुरा के ले जाय तो दिन दुपहरिया में लालटेन लेकर एक ऐसा हरिश्चंद्र बाप खोज पाना मुश्किल होगा जो बच्चे से ये भी पूछ ले की कहाँ से लाये,सब छुपाने में लग जायेंगे।
अतः यह कहना तो गलत होगा की सब गलत ही हैं लेकिन सुरेश कलामानियों की कमी भी नहीं हैं। इस लिए एक पहल ही सही इन घोटालेबाजों पर बिना किसी इंतजार के फासी मढ़ द्देनी चाहिए फिर जाके ये मंगल ग्रह पर नया राष्ट्रमंडल रचाएं ।